जब दरिया ए नील सूख जाता था तो कुंवारी लड़की की बली दी जाती थी- जानिये कैसे रुका ये सिलसिला
हजरत अमर बिन आस ने फ़रमाया हम इस ज़ुल्म के खिलाफ हैं इस्लाम किसी हालत में इस बात की इजाजत नहीं देता है कि किसी बेक़सूर को जिंदा दरिया में डाल दिया जाए,उन्होंने कहा मैं हजरत उमर रज़ी अल्लाहु अन्हु को ख़त लिखता हूँ जब तक जवाब न आये आप लोग इन्तिज़ार करो.
हाकिम ने पूरा मामला लिखकर मदीना शरीफ भेजा,हजरत उमर ने जब यह ख़त पढ़ा तो एक तारीखी ख़त लिखा,”ए दरियाए नील अगर तू खुद से जारी हुआ करता था तो हमको तेरी ज़रुरत नहीं है और अगर तू अल्लाह ताला के हुक्म से जारी होता था तो मैं तुझे हुक्म देता हूँ कि तू फिर से अल्लाह के नाम पर जारी होजा”
आप ने इस ख़त को लिफ़ाफ़े में बंद कर दिया और कासिद को दिया कि इसे दरियाए नील में डाल दिया जाए,जैसे ही इस ख़त को दरिया में डाला गया तो दरिया तुरंत जारी होगया और ऐसा जारी हुआ कि आज तक नहीं सूखा है.

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